अंधेरा अब सिर्फ वैभव का पीछा नहीं कर रहा था, बल्कि उसकी हर सांस, हर कदम और हर सोच को निगलने लगा था। दादाजी की डायरी में लिखे शब्द लगातार उसे कंपा रहे थे—“तुमने मेरी डायरी छू ली। अब तुम मेरे हो।”
डायरी: खतरा या रक्षा?
रातभर वैभव सो नहीं पाया। हर चरचराहट उसे उसी कमरे में ले जाती, जहाँ उसने अंधेरे की मौजूदगी महसूस की थी। डायरी मेज पर खुली रखी थी—मानो उसमें छिपा राज अभी भी जीवित हो।
वह उसे फेंकना चाहता था, जलाना चाहता था… पर भीतर की आवाज़ कहती थी—“यही डायरी उसकी एकमात्र ढाल है।”
नक्शा और रहस्यमयी ‘X’
सुबह धूप ने कोठी को थोड़ा सुरक्षित महसूस करवाया, पर डर हवा में अब भी तैर रहा था। डायरी का वही नक्शा उसके सामने था—कोठी, जंगल, नदी और नदी किनारे एक ‘X’।
दादाजी ने लिखा था:
“अंधेरे को रोकने का रास्ता उसी प्रकाश में है, जो उसकी आत्मा से जन्मा हो।”
क्या ‘X’ उसी प्रकाश से जुड़ा था?
जंगल का सफर: घुटन भरी खामोशी
वैभव ने बैग में टॉर्च, चाकू और डायरी रखी और जंगल की ओर निकल पड़ा। पेड़ चुप थे—जैसे कुछ होने का इंतजार कर रहे हों।
नदी किनारे पहुँचते ही उसने विशाल बरगद का पेड़ देखा। नक्शे के ‘X’ से सब कुछ मेल खा रहा था। झाड़ियों के पीछे उसे एक गड्ढा दिखा—जिसमें एक पत्थर का बक्सा छिपा था।
पत्थर का बक्सा और ‘आत्मा का दीया’
बक्से पर बने प्रतीक डायरी के निशानों जैसे थे। ढक्कन हटते ही उसकी सांस अटक गई। अंदर था:
- एक प्राचीन धातु का दीपक
- एक पुराना चर्मपत्र
चर्मपत्र पर दादाजी की लिखावट थी:
“यह आत्मा का दीया है। यह साधारण लौ से नहीं जलता। इसे जलाने के लिए तुम्हें उस मूल स्थान पर जाना होगा… उस कोठड़ी में, जहाँ आग लगी थी और एक परिवार खाक हो गया था।”
सच्चाई अब सामने थी—अंधेरा किसी भूत का नहीं, बल्कि एक त्रासदी का जन्मा हुआ प्रेत था।
जंगल की छायाएँ… किसी की नजर
शाम ढल चुकी थी। जंगल अंधेरा निगलने लगा था। वैभव ने महसूस किया कि कोई उसे देख रहा है। पेड़ों की परछाइयाँ असामान्य रूप से लंबी हो रही थीं। हवा अचानक बर्फ़ जैसी ठंडी हो गई।
वह तेजी से कोठी की ओर भागने लगा।
डरावने उंगलियों के निशान
जैसे ही वह कोठी पहुँचा, उसकी नजर बरामदे की खिड़की पर गई—
लंबी, नुकीली, इंसान से अलग उंगलियाँ। और ये निशान बाहर की ओर से बने थे…
मतलब साफ था—अंधेरा रातभर कोठी के अंदर था और अब बाहर भी था। वह उसका पीछा कर रहा था।
दादाजी की आवाज़… या कोई जाल?
वैभव ने अंदर घुसकर दरवाजा बंद किया। उसी समय ऊपर से एक आवाज़ आई—
एक बूढ़े आदमी की रोती, घुटती, दर्दभरी आवाज़: “वै… भव…”
आवाज़ दादाजी जैसी थी। उसकी आँखें भर आईं। क्या दादाजी की आत्मा फँसी हुई थी? या यह अंधेरे का दिया हुआ धोखा था?
अंधेरे का सामना या भावनाओं का जाल?
बैग में रखा आत्मा का दीया उसकी एकमात्र उम्मीद था। पर ऊपर से आती पुकार उसे उसी घातक कमरे की ओर खींच रही थी।
दादाजी का प्यार… या अपनी जान बचाने की चेतावनी?
वैभव ने सीढ़ियों पर कदम रखा।
क्या वह फँसने जा रहा था? या फिर पहली बार, सही हथियार के साथ, अंधेरे का सामना करने वाला था?
(भाग 2 समाप्त – Part 3 जल्द ही)
